Monday, August 10, 2009

‘गंदे नाले और नाली क्या’


इस महंगाई के आलम में,


अब होली क्या दीवाली क्या।


उल्टे रेज़र से मूँड रहे,


तब रहे कहीं हरियाली क्या।


जनता तो भेड़ बिचारी है,


हर जगह हज़ामत होती है,


ये बाढ़ ग्राण्ट की कागज में,


मिटगई कहीं बदहाली क्या।


सौ रूपये किलो जब दाल मिले,


अस्सी का चावल हाटों में,


क्या हम खाऐं, बच्चे खाऐं,


और खा पाए घरवाली क्या।


सिन्थेटिक दूध मिठाई है,


सब्जी मिलती इंजेक्शन की,


इस घोर मिलावट के युग में,


कुछ मिले कहीं टकसाली क्या।


है क्लास तीसरा बच्चे का,


पर डेढ़ लाख पर ईयर फीस,


कुल बीस हजार मिलें हमको,


खाली बैठे घरवाली क्या।


रिश्वत का काला धन लेकर,


रख रहे विदेशी खातों में,


अब तुम्हीं कहो इस भारत में,


रह पायेगी खुशहाली क्या।


जाली नोटों के बण्डल अब,


चल रहे अधिकतर बैंको में,


तनखा में जितने नोट मिले,


देखो उन में हैं जाली क्या।


सरकार सरक कर चलती है,


धीरे-धीरे, मंथर-मंथर,


कैसे बन जाए सुपरफास्ट,


जिव्हा यह लालू वाली क्या।


जिस तरह भ्रूण हत्यायें कर,


तुम मार रहे कन्याओं को,


इकतरफा उगते लड़कों को,


मिल पाये कहीं घरवाली क्या।


डूबें कैसे और मरें कहाँ,


चुल्लू भर पानी मिला नहीं,


हो गए बन्द अब ’राज’ सभी,


गन्दे नाले और नाली क्या।

6 comments:

Anonymous said...

KYON????????
SACH KA SAAMANAA KARNE KI HIMMAT NAHI THI KYAA.
SHAAYAD ISILIYE MERI PAHALEWALI TIPPANI HATA DI.
MAIN PHIR LIKH RAHA HOON KI HINDI KEE KAVITAA MEN ENGLISH SHABDON KA PRAYOG KYON KIYA HAI AAPNE.

ममता राज said...

manyvar
aapki tippani ka dhanyavad . kavita main bhav prabal hhota hai.bhasha jo samajh main aaye usi ka prayog
achcchha hota hai aisa mere guruon ne bataya tha .

सागर नाहर said...

हमें कविता की समझ नहीं है पर यह कविता हमें बहुत पसन्द आई। एक बार नहीं तीन बार पढ़ी।
अनामी जी से बिल्कुल सहमती नहीं है।
आप इसे कविता समझें ही क्यों, यह राज साहब के भाव हैं जो इस कविता के रूप में प्रकट हुए हैं, सो अंग्रेजी भाषा के शब्द आना अप्रासंगिक नहीं है।
और वैसे भी आजकल कई कवि हिन्दी- अंग्रेजी मिलाकर मंच पर कविता पढ़ कर वाहवाही लूटते है।

सागर नाहर said...

यही बात अगर अनामीजी देवनागरी में लिखकर कहते तो ठीक लगता, अब हिन्दी में टाइप करना इतना भी मुश्किल नहीं।

भूतनाथ said...

ऐसी चीज़ें पढ़-पढ़ कर हम सोच रहे,कि अब बजाये ताली क्या.....!!
जो बिन मतलब ना बात बढाए....ऐसी भी कोई घरवाली क्या....!!
खोटा सिक्का ही पाकेट का बाज़ार में पहले आ जाता है
चल जाए बस इतना काफी,असली क्या और जाली क्या !!

jayanti jain said...

great feeling,