
इस महंगाई के आलम में,
अब होली क्या दीवाली क्या।
उल्टे रेज़र से मूँड रहे,
तब रहे कहीं हरियाली क्या।
जनता तो भेड़ बिचारी है,
हर जगह हज़ामत होती है,
ये बाढ़ ग्राण्ट की कागज में,
मिटगई कहीं बदहाली क्या।
सौ रूपये किलो जब दाल मिले,
अस्सी का चावल हाटों में,
क्या हम खाऐं, बच्चे खाऐं,
और खा पाए घरवाली क्या।
सिन्थेटिक दूध मिठाई है,
सब्जी मिलती इंजेक्शन की,
इस घोर मिलावट के युग में,
कुछ मिले कहीं टकसाली क्या।
है क्लास तीसरा बच्चे का,
पर डेढ़ लाख पर ईयर फीस,
कुल बीस हजार मिलें हमको,
खाली बैठे घरवाली क्या।
रिश्वत का काला धन लेकर,
रख रहे विदेशी खातों में,
अब तुम्हीं कहो इस भारत में,
रह पायेगी खुशहाली क्या।
जाली नोटों के बण्डल अब,
चल रहे अधिकतर बैंको में,
तनखा में जितने नोट मिले,
देखो उन में हैं जाली क्या।
सरकार सरक कर चलती है,
धीरे-धीरे, मंथर-मंथर,
कैसे बन जाए सुपरफास्ट,
जिव्हा यह लालू वाली क्या।
जिस तरह भ्रूण हत्यायें कर,
तुम मार रहे कन्याओं को,
इकतरफा उगते लड़कों को,
मिल पाये कहीं घरवाली क्या।
डूबें कैसे और मरें कहाँ,
चुल्लू भर पानी मिला नहीं,
हो गए बन्द अब ’राज’ सभी,
गन्दे नाले और नाली क्या।
